मंगलवार, 1 नवंबर 2011

ओ वतन के नोजवां --


ओ वतन के नोजवां जा रहा है तू कहां।
 याद कर वो दास्तां जिसको गाता है जहां।।


थर-थराती थी जमीं जब कदम धरता था तू।
काल भी हो सामने पर नहीं डरता था तू।
आज भी करते बयां ये जमीं ये आसमां।।1।।

रहजनों हमलावरों का सिर झुकाया था कभी।
बाजुए कुव्वत में तेरी नभ हिलाया था कभी।
हाथ ले तीरों कमां तू मगर बढ़ता गया।।2।।

तूने रखी लाज अपने बहनों के सिन्दूर की।
चाल भी चलने न पाई दुष्ट पापी क्रूर की।
उनकी वो खरमस्तियां मेट डाली हस्तियां।।3।।

क्या कहूं ‘बेमोल’ तेरा आज कैसा ढंग है।
रंग महफिल में भी तेरा रंग सब बदरंग है।
खो दिया सब हौसला शिवा और प्रताप का।।4।।


लय- जब चली ठंडी हवा ---
रचनाः- स्व. श्री लक्ष्मणसिंह जी ‘बेमोल’

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें