बुधवार, 5 नवंबर 2014

दुनियां वालो देव दयानंद......

दुनियां वालो देव दयानंद दीप जलाने आया था |
भूल चुके थे राहें अपनी वह दिखलाने लाया था |

 देव दयानंद
घोर अँधेरा जग में छाया नजर नही कुछ आता था |
मानव मानव की ठोकर से जब ठुकराया जाता था |

आर्य जाति सोई पड़ी थी घर घर जा के जगाता था |
दुनियां वालो देव दयानंद दीप जलाने आया था |१

बंट गया सारा टुकड़े टुकड़े भारत देश जागीरो में |
शासन करते लोग विदेशी जोश नही था वीरो में |
भारत माँ को मुक्त किया जो जकड़ी हुयी थी जंजीरों में |
दुनिया वालो देव दयानंद दीप जलाने आया था |२

जब तक जग में चार दिशाएं कुदरत के ये नजारे है |
सागर,नदियां,धरती ,अम्बर ,जंगल ,पर्वत सारे है |
पथिक रहेगा नाम ऋषि का जब तक चाँद सितारे है |
दुनिया वालो देव दयानंद दीप जलाने आया था |
भूल चुके थे राहें अपनी वह दिखलाने आया था |३

सोमवार, 20 जनवरी 2014

धरती में चाँदी और सोना पैदा करता रहा किसान।

धरती में चाँदी और सोना पैदा करता रहा किसान।
महलों में सोने वाले तू जान सके तो जान।।



धरती माँ का वीर सिपाही सर्दी और बरसातों में।
तुम क्या जानो कैसे मरता घोर अन्धेरी रातों में।
नहीं बेचारे के हाथों में रोटी कपड़ा और मकान।।१।।

मेहनत कस लोगों के तन पर केवल एक लंगोटी है।
फौलादी हाथों में केवल गंठा सूखी रोटी है।
हंसते-हंसते किया देश पर तन-मन-धन सारा कुर्बान।।२।।

धरती के कण-कण में इसका बहता खून-पसीना है।
पत्थर भी मेहनत के बल पर बनता एक नगीना है।
इसका सब कुछ छीना है पर फिर भी खुलती नहीं जुबान।।३।।

देश कहाँ उत्थान करेगा जब कृषक खुशहाल न हो।
रोटी देने वालों का भी रोटी एक सवाल न हो।
सूखी धरती लाल न हो तू इनकी पीड़ा को पहचान।।४।।