ये नर तन तुम्हें निरोग मिला, सत्संग का भी योग मिला।
फिर भी प्रभु कृपा अनुभव करके यदि भवसागर तुम तर न सके।
फिर मत कहना कुछ कर न सके।।
तुम सत्य तत्त्व ज्ञानी होकर, तुम सहधर्मी ध्यानी होकर।
तुम सरल निरभिमानी होकर, कामना विमुक्त विचर न सके।
फिर मत कहना कुछ कर न सके।।१।।
जग में जो कुछ भी पाओगे, सब यही छोड़कर जाओगे।
पछताओगे आगे यदि तुम अपना पुण्यों से जीवन भर न सके।
फिर मत कहना कुछ कर न सके।।२।।
जो सुख सम्पत्ति में भूल रहे, वो वैभव मद में फूल रहे।
उनसे फिर पाप डरेंगे क्यों, जो परमेश्वर से डर न सके।
फिर मत कहना कुछ कर न सके।।३।।
जब अन्त समय आ जायेगा, तब तुम से क्या बन पायेगा।
यदि समय शक्ति के रहते ही आचार-विचार सुधर न सके।
फिर मत कहना कुछ कर न सके।।४।।
होता जब तक न सफल जीवन, है भार रूप स बतन-मन-धन।
यदि ‘पथिक’ प्रेम पथ पर चलकर अपना या पर दुःख हर न सके।
फिर मत कहना कुछ कर न सके।।५।।
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