जाते-जाते ये ऋषिवर कह गये।
मेरे जो सपने अधूरे रह गये।
मेरी वसीयत याद रखना आर्यों।
सत्य को ही मन में अपने धारियो।
पाप की धारा में क्यों तुम बह गये।।1।।
आर्य जो मजहबों में बट गये।
देश के हिस्से इसलिए कट गये।
खुद को खुद ही आज क्यों तुम दह गये।।2।।
हमने अपने भाई भी ठुकरा दिये।
हिन्दू मुस्लिम और ईसाई किये।
गैरों की मारों को चुपके सह गये।।3।।
मानते कहना अगर ऋषिराज का।
और ही होना था भारत आज का।
‘आशा’ सपनों के किले सब ढह गये।।4।।
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