गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

तुम हो प्रभु चाँद मैं हूँ चकोरा---


तुम हो प्रभु चाँद मैं हूँ चकोरा।
तुम हो कमल फूल, मैं रस का भौंरा।।



ज्योति तुम्हारी का मैं हूँ पतंगा।
आनन्द-घन तुम हो मै बन का मोरा।।१।।

जैसे है चुम्बक की लोहे से प्रीति।
आकर्षण करे मोह लगातार तोरा।।२।।

पानी बिना जैसे हो मीन व्याकुल।
ऐसे ही तड़पाये तोरा बिछोरा।।३।।

इक बून्द जल का मैं प्यासा हूँ चातक।
अमृत की करो वर्षा हरो ताप मोरा।।४।।

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

जय जय पिता परम आनन्ददाता--


जय जय पिता परम आनन्ददाता।
जगदादि कारण मुक्ति-प्रदाता।।



अनन्त और अनादि विशेषण हैं तेरे।
तू सृष्टि का स्रष्टा तू धर्ता संहर्ता।।१।।

सूक्ष्म से सूक्ष्म है स्थूल इतना।
कि जिसमें यह ब्रह्माण्ड सारा समाता।।२।।

मैं लालित व पालित हूँ पितृस्नेह का।
यह प्राकृत सम्बन्ध है तुझसे त्राता।।३।।

करो शुद्ध निर्मल मेरी आत्मा को।
करूँ मैं विनय नित्य सायं व प्रातः।।४।।

मिटाओ मेरे भय के आवागमन के।
फिरूँ न मैं जन्म पाता और बिलबिलाता।।५।।

बिना तेरे है कौन दीनन का बन्धु।
कि जिसको मैं अपनी अवस्था सुनाता।।६।।

‘अमी’ रस पिलाओ कृपा करके मुझको।
रहूँ सर्वदा तेरी कीर्ति को गाता।।७।।

तू है सच्चा पिता सारे संसार का ओम् प्यारा--


तू है सच्चा पिता सारे संसार का ओम् प्यारा।
तू ही, तू ही रक्षक हमारा।।

परमात्मा की अद्भुत लीला 


चाँद सूरज सीतारे बनाये पृथ्वी आकाश पर्वत सजाये।
अन्त पाया नहीं तेरा पाया नहीं वार-पारा।।१।।

पक्षीगण राग सुन्दर हैं गाते जीव-जन्तु भी सिर हैं झुकाते।
उसको भी सुख मिला तेरी राह पर चला जो भी प्यारा।।२।।

पाप-पाखण्ड हमसे छुड़ाओ, वेद मार्ग पे हमको चलाओ।
लगे भक्ति में मन करें सन्ध्या-हवन जगत् सारा।।३।।

अपनी भक्ति में मन को लगाना, ‘लाल’ दुःख दूर सारे मिटाना।
दुखिया कंगालों का और धनवालों का तू सहारा।।४।।

तेरे दर को छोड़कर किस दर जाऊँ मैं।



तेरे दर को छोड़कर किस दर जाऊँ मैं।
सुनता मेरी कौन है किसे सुनाऊँ मैं।।

जब से याद भुलाई तेरी, लाखों कष्ट उठायें हैं।
क्या जानूँ इस जीवन अन्दर कितने पाप कमायें हैं।
हूँ शर्मिन्दा आपसे, क्या बतलाऊँ मैं।।¬१।।

मेरे पाप कर्म ही तुझसे प्रीत न करने देते हैं।
कभी जा चाहूँ मिलूँ आपसे घेर मुझे ये लेते हैं।
कैसे स्वामी आपके दर्शन पाऊँ मैं।।२।।

है तू नाथ ! वरों का दाता तुझसे सब वर पाते हैं।
ऋषि-मुनि और योगी सारे तेरे ही गुण गाते हैं।
छींटा दे दो ज्ञान का, होश में आऊँ मैं।।३।।

जो बीती सो बीती लेकिन बाकी उमर सम्भालूँ मैं।
प्रेमपाश में बन्धा आपके गीत प्रेम से गालूँ मैं।

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

अजब हैरान हूँ भगवन् ! तुम्हें कैसे रिझाऊँ मैं



अजब हैरान हूँ भगवन् ! तुम्हें कैसे रिझाऊँ मैं।
कोई वस्तु नहीं ऐसी जिसे सेवा में लाऊँ मैं।।

करें किस तौर आवाहन कि तुम मौजूद हो हर जो।
निरादर है बुलाने को अगर घण्टी बजाऊँ मैं।।१।।

तुम्हीं हो मूर्ति में भी, तुम्हीं व्यापक हो फूलों में।
भला भगवान् पर भगवान् को कैसे चढ़ाऊँ मैं।।२।।

लगाना भोग कुछ तुमको, यह एक अपमान करना है।
खिलाता है जो सब जग को, उसे क्योंकर खिलाऊँ मैं।।३।।

तुम्हारी ज्योति से रोशन हैं सूरज, चाँद और तारे।
महा अन्धेर है कैसे तुम्हें दीपक दिखाऊँ मैं।।४।।

भुजायें हैं न गर्दन है, न सीना हे न पेशानी।
तुम हो निर्लेप नारायण ! कहाँ चन्दन लगाऊँ मैं।।५।।


बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

नाथ करुणा करो, ये हृदय के हरो, दोष सारे-------



नाथ करुणा करो, ये हृदय के हरो, दोष सारे,
पूज्य पावन प्रभु जी हमारे।

जाप जिसने तुम्हारा किया है,
जन्म उसका सफल कर दिया है।
काम-क्रोधारि खल-दल प्रबल,
मल अरल विघ्न टारे।।¬१।।

पास रहते हो हरदम हमारे,
पर नहीं देख पाते तुम्हें हम।
बुद्धि दो ज्ञान दो भक्ति
का दान दो प्राणप्यारे।।२।।

नील आकाश तम्बू बनाया,
भूमि-सा क्या बिछौना बिछाया।
धन्य करतार कवि, रच दिये
लोक रवि चन्द्र तारे।।३।।

तज तुम्हें कौन के जायें द्वारे,
तुम बिना कौन बिगड़ी संवारे।

यहां गीत अधूरा है किसी के पास हो तो कृपया प्रेषित करें।

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

ओम् नाम का सुमिरन करले कर दे भव से पार तुझे




ओम् नाम का सुमिरन करले कर दे भव से पार तुझे।
कह लिया कितनी बार तुझे।।स्थाई।।


जिस नगरी में वास तेरा यह ठग चोरों की बस्ती है।
लुट जाते हैं बड़े-बड़े यहां फिर तेरी क्या हस्ती है।
जिसको अपना समझ रहा ये धोखा दे संसार तुझे।।1।।


हाथ पकड़कर गली-गली जो मित्र तुम्हारे डोल रहे।
कोयल जैसी मीठी वाणी कदम-कदम पर बोल रहे।
बनी के साथी बिगड़ी में ना गले लगाये यार तुझे।।2।।


दौलत का दीवाना बनकर धर्म कर्म सब भूल रहा।
पाप पुण्य कुछ पता नहीं क्यों नींद नशे में टूल रहा।
ईश्वर को भी नहीं जानता ऐसा चढ़ा खुमार तेरे।।3।।


तुझसे पहले गये बहुत से कितना धन ले साथ गये।
‘लक्ष्मणसिंह बेमोल’ कहे वो सारे खाली हाथ गये।
तू भी खाली हाथ चलेगा देखेंगे नर नार तुझे।।4।।

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

जमाने को सच्चा सखा मिल गया



जमाने को सच्चा सखा मिल गया।
दयानन्द सा देवता मिल गया।।

ये नैया वतन की भंवर में पड़ी।
खड़ी सामने थी मुसीबत बड़ी।
अचानक इसे ना खुदा मिल गया।।1।।

तरफदार कन्याओं  अबलाओं का।
हितैषी अनाथों का विधवावों का।
हमें राह में रहनुमा मिल गया।।2।।

परेशानियों मन्दे हालों के बाद।
बिछुड़ा पड़ा बहुत सालों के बाद।
कि बच्चों को उनका पिता मिल गया।।3।।

धर्म देश जाति की भक्ति मिली।
नई जिन्दगी नई शक्ति मिली।
‘पथिक’ क्या कहे क्या से क्या मिल गया।।4।।

रचनाः- श्री सत्यपाल जी ‘पथिक’

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

सात बजे जिस वक्त सवेरे जब मैं फांसी पाऊंगा



सात बजे जिस वक्त सवेरे जब मैं फांसी पाऊंगा।
फांसी पर चढ़ने से पहले सन्ध्या हवन रचाऊंगा।।

अमर शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल'

आप होंगे सैकड़ों शस्त्रबन्ध मेरी जान अकेली है।
जिसको तुमने मृृत्यु समझा वह तो मेरी सहेली है।
जेलें काटी भूखा मरा मैंने सकल तबाही झेली है।
अन्तिम हथियार था फांसी का वह भी बला सर ले ली है।
फांसी का डर नहीं मुझे मैं ले जन्म दुबार आऊंगा।।1।।

ब्रिटिश साम्राज्य के अन्दर हवन मन्त्र की बोली हो।
घृत सामग्री की आहुति एक-एक पिस्टल की गोली हो।
आजादी के जंग में लड़ें जो नोजवाानों की टोली हो।
गोली से जो खून बहेगा वो होली में रंग रोली हो।
इस होली को तुम ही देखना मैं तो चला ही जाऊंगा।।2।।

कुर्बानी खाली नहीं जाती ये भी आपको याद रहे।
भारत का बच्चा-बच्चा बन बिस्मिल राम प्रसाद रहे।
जब तक गोरे रहे हिन्द में लड़ने का सिंहनाद रहे।
इन गोरों की हकूमत को करके हम बर्बाद रहे।
भारत के कोने-कोने में क्रान्ति की आग लगाऊंगा।।3।।

घृत सामग्री मिली बिस्मिल को सन्ध्या हवन रचाया गया।
वन्दे मातरम् का गाना फांसी से पहले गाया गया।
सात बजे ठीक सवेरे फांसी पर लटकाया गया।
मरकर जिन्दा रहने का यह सबको पाठ पढ़ाया गया।
कहे ‘भीष्म’ सुनने वालों को मैं ज्यादा नहीं रुलाऊंगा।।4।।

गोरखपुर की जेल में बैठा मां को लिखता परवाना---


गोरखपुर की जेल में बैठा मां को लिखता परवाना।
देश धर्म का दीवाना ।।
अमर शहीद राम प्रसाद 'बिस्मिल'


जन्मदात्री जननी मेरी ले अन्तिम प्रणाम मेरा।
जन्म-जन्म तक ना भूलूंगा मैं माता जी अहसान तेरा।
सेवा ना कर सका आपकी यही मेरा है पछताना।।1।।

मेरी मौत का मेरी मात से जब सन्देश सुनाये।
मेरी याद में तेरी आंख से आंसू ना बह जाये।
वतन पर मरने वालों की मां को ना चाहिये घबराना।।2।।

सब माताओं की माता है मेरी भारत माता।
उसकी आजादी की भेंट में चढ़ने को मैं जाता।
जिसको प्यार नहीं माता से उसका अच्छा मर जाना।।3।।

होगा वतन आजाद एक दिन ऐसा भी आयेगा।
स्वर्ण अक्षरों में मां तेरा नाम लिखा जायेगा।
‘खेमसिंह’ भी गायेगा मां बना-बना तेरा गाना।।4।।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

हो समय ने फिर ललकारा है--


हो समय ने फिर ललकारा है।
देश धर्म द्रोहियों से लड़ना हमारा नारा है।।स्थाई।।

हम भारत के वासी हमारा राज प्रजातन्त्र है।
वेदों के उपासक हमारी संस्कृति पवित्रा है।
खुद जीयें और जीने दें ऐसा हमारा चरित्र है।
कभी इन्सानियत से हमने रिश्ता तोड़ा नहीं।
सच्चाई कि रास्ते से हमने मुंह मोड़ा नहीं।
जिसने हमको छेड़ा पहले उसको हमने छोड़ा नहीं।
हो जानता यह जग सारा है
बड़े-बड़े खूंखारों का हमने मुंह मारा है।।1।।

देश की अखण्डता को खण्डित नहीं होने देंगे।
आपस में हम फूट के बीज नहीं बोने देंगे।
आजादी रूपी दौलत को हरगिज नहीं खोने देंगे।
 जो करते हैं बकवास आज गैरों के इशारों पर।
लानत है ऐसे देश द्रोही गद्दारों पर ।
करें न विश्वास कभी भूलकर मक्कारों पर।
 हो हुआ दिल दुःखी हमारा है।
ईंट का जवाब देंगे पत्थर से और न चारा है।।2।।

गर पहले हमारे नेता ऐसी गलती खाते ना।
तो आज के ये दिन कभी देखने में आते ना।
मुट्ठी भर ये लोग कभी शोर यों मचाते ना।
हमने इनकी नीयत को अच्छी तरह पहचाना है।
चण्डीगढ़ का फैसला तो झूठा सा बहाना है।
सिर्फ इनका एक खालिस्तान का निशाना है।
हो खास गैरों का इशारा है।
हो खुलमखुल्ला पापिस्तान ये नाच नचारा है।।3।।

देश को जरूरत है मजबूत कर्णधारों की।
देश को जरूरत है पटेल से सरदारों की।
देश को जरूरत नहीं इन फिल्मी सितारों की।
कुर्सी के पुजारी अपनी कुर्सी को बचाते रहेंगे।
ये कर दिया वो कर दिया शोर यों मचाते रहेंगे।
उधर बेगुनाहों का खून वो बहाते रहेंगे।
हो बड़ा ये खतरा भारा है
कहे ‘खेमसिंह’ कहीं देश का ना हो जाये बटवारा है।।4।।

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

ऐ ऋषि याद आये जमाना तेरा।


ऐ ऋषि याद आये जमाना तेरा।
ऐ ऋषि काम वेदों का लाना तेरा।।

अन्धियारी रात में कोई ना था साथ में।
ऋषि था अकेला और वेद थे हाथ में।
ऐसी मुश्किलों में यहां आना तेरा।।1।।

हवा प्रतिकूल थी नहीं अनुकूल थी।
समझा ना जग ने तुझको बड़ी भारी भूल की।
न छोड़ा जालिमों ने सताना तेरा।।2।।

लगा जब सुधारने काशी हरिद्वार में।
फैंक भी दिया तुझको गंगा की धार में।
काम था प्रभु का बचाना तेरा।।3।।

चला छोड़ बस्ती का तजा बुतपरस्ती को।
उदयपुर में ठुकराया था लाखों की हस्ति को।
दिल था प्रभु का दिवाना तेरा।।4।।

कार्तिक का महिना था अभी बहुत जीना था।
पिलाया था जहर पापी जगन्नाथ कमीना था।
‘कर्मठ’ जहर पीकर भी मुस्कुराना तेरा।।5।।

जाते-जाते ये ऋषिवर कह गये।
















जाते-जाते ये ऋषिवर कह गये।
मेरे जो सपने अधूरे रह गये।

मेरी वसीयत याद रखना आर्यों।
सत्य को ही मन में अपने धारियो।
पाप की धारा में क्यों तुम बह गये।।1।।

आर्य जो मजहबों में बट गये।
देश के हिस्से इसलिए कट गये।
खुद को खुद ही आज क्यों तुम दह गये।।2।।

हमने अपने भाई भी ठुकरा दिये।
हिन्दू मुस्लिम और ईसाई किये।
गैरों की मारों को चुपके सह गये।।3।।

मानते कहना अगर ऋषिराज का।
और ही होना था भारत आज का।
‘आशा’ सपनों के किले सब ढह गये।।4।।

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

उठो देश के वीर जवानों, जग को आर्य बनाना है---


उठो देश के वीर जवानों, जग को आर्य बनाना है।
कृण्वन्तो विश्वमार्यमका वैदिक नाद गुंजाना है।।टेक।।




आर्य समाज है माता अपनी, दयानन्द पिता हमारा है।
मात-पिता की आज्ञापालन करना फर्ज हमारा है।
दिया है जीवन पावन हमको, इसका कर्ज चुकाना है।।01।।

आने वाले तूफानों से, आर्यवीरों लड़ना है।
हाथ में लेकर ओम् पताका, निशिदिन आगे बढ़ना है।
वेद वाणी से नवयुवकों का सोया साहस जगाना है।।02।।

आर्यवीर दल देश का रक्षक, इतिहास गवाही देता है।
देव, पितृ और ऋषि के ऋण को, कंधों ऊपर लेता है।
संस्कृति-रक्षा, शक्ति-संचय, सेवा-भाव बढ़ाना है।।03।।

आर्यावर्त ये भारत अपना, जग में रोशन नाम करें।
संकट पड़े कभी जो इस पर, जीवन भी कुर्बान करें।
आर्यवीर दल की समां का, ‘‘संजीव’’ बना परवाना है।।04।।



आर्यवीर संजीव आर्य 
मुख्य-संरक्षक 
गुरुकुल कुरुक्षेत्र 

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

बहनों तुम करो विचार-विचार----


बहनों तुम करो विचार-विचार।
ये जीवन सफल बनाने का।।टेक।।











प्रातः समय नित ईश्वर-चिन्तन।
शौच सफाई दांतो पर दन्तन।
करो परस्पर प्यार- हां प्यार।।01।।

हवन से बढकर नहीं काम है।
सुखों का सागर चारों धाम है।
करो हवन से तुम महकार-महकार।।02।।

सास-श्वसुर तेरे मात-पिता हैं।
पति राम तेरे तू सीता है।
तेरा सीता सम-व्यवहार।।03।।

चोरी, चुगली झूठ छोड़ दे।
शराब की बोतल ठाके फोड़ दे।
ये जीवन करे दुष्वार- दुष्वार।।04।।

यज्ञ संध्या और बड़ों की सेवा।
शुभ कर्म मीठे फल मेवा।
करते हैं बेड़ा पार-पार।।05।।

ऊत भूत और डोरी गण्डे।
तुम्हें बहकावें जो मस्टण्डे।
ये श्याणे नीच मक्कार- मक्कार।।06।।

आर्यवीर ‘‘संजीव’’ का गाना।
सुनना और सुन ध्यान लगाना।
ये आर्यों का प्रचार- प्रचार।।07।।




रचना- 
श्री संजीव कुमार आर्य
मुख्य-संरक्षक, गुरुकुल कुरुक्षेत्र

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012




अटल है इरादा, अपने राष्ट्र को बचायेंगे।
स्वदेशी अपनायेंगे, विदेशी भगायेंगे।।

नये-नये जहर आकर विदेशी बनाते हैं।
प्रचार है अनोखा, भोली जनता को बहकाते हैं।
मिरिण्डा और पेप्सी कोला पीवे ना पिलायेंगे।।01।।

अलग-अलग साबुन देखो, बाजारों में लाये हैं।
दाम इनके बड़े भारी, लूट-लूट खायें हैं।
लक्स, लिरिलि, ओ.के. कभी पियर्स से ना नहायेंगे।।02।।

कोलगेट और क्लॉज अप जैसे पेस्ट बनाते हैं।
हड्डियों का चूरा डाल, सेकरीन मिलाते हैं।
त्रिफला, त्रिकुटात्र तूतिया, माजुफल मिलायेंगे।।03।।

शुद्ध सादा नमक छोड़, पीसा हुआ लाये हैं।
पांच गुने दाम एक किलो पर बढाये हैं।
कैप्टेनकुक नमक ‘‘संजीव’’ कभी नहीं खायेंगे।।04।।

रचना- श्री संजीव कुमार आर्य
मुख्य-संरक्षक, गुरुकुल कुरुक्षेत्र

लय-चुप-चुप खडे़ हो.................




गुरुवार, 20 सितंबर 2012

हे प्रभो मेधा बुद्धि दीजै--


ओम्- यां मेधां देवगणाः पितरोश्चोपासते।
तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा।।










हे प्रभो मेधा बुद्धि दीजै।
कर्म हमारे पावन कीजै।।

जिसको ध्यावें देव पितर सब।
वह सुमति हमें अब ही दीजै।।

तुम हो ईश्वर अगन सुपावन।
भाव हमारे उज्ज्वल कीजै।।

रचना- नन्द किशोर आर्य 
प्राध्यापक-संस्कृत 

बलिदान हुए जो देश की खातिर----


बलिदान हुए जो देश की खातिर, देश की खातिर मेरे राष्ट्र की खातिर।
हां जी हां ये उनको नमन है।।टेक।।


शनिवार, 1 सितंबर 2012

हे प्रभो दूर करो दुरितानि--


ओम्- विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।
यद्भद्रं तन्न आ सुव।।



हे प्रभो दूर करो दुरितानि।
पास रहो हमरे तुम दानी।।

भाव हमारे श्रेष्ठ बनाओ।
श्रेय गहे बनकर के ज्ञानी।।

देव हमारे सविता तुम हो।
रहूँ मैं तुमरे बन ढिग ध्यानी।।



रचना- नन्दकिशोर आर्य
प्राध्यापक संस्कृत गुरुकुल कुरुक्षेत्र

ओम् नाम नित बोल रे मन


ओम् नाम नित बोल रे मन ओम् नाम नित बोल ।
मनवा ओम् नाम नित बोल

ओम् नाम है प्रभु का प्यारा
यही है तेरा तारण हारा
इधर-उधर मत डोल
मनवा ओम् नाम नित बोल।।01।।

मानव का तन तूने पाया
सर्वोत्तम जो गया बताया
चोला ये अनमोल
मनवा ओम् नाम नित बोल।।02।।

जिह्वा से तू ओम् सुमर ले 
भव सागर से पार उतर ले
कटु वचन मत बोल
मनवा ओम् नाम नित बोल।।03।।

ओम् नाम से प्रीत लगाले
मन मन्दिर में जोत जगाले
लगता ना कुछ मोल
मनवा ओम् नाम नित बोल।।04।।

अमृम झरना झर-झर झरता
पीकर क्यों ना पार उतरता
जहर ना इसमें घोल
मनवा ओम् नाम नित बोल।।05।।

मोह माया के बंधन सारे
जीवन तेरा खाक बनारे
बंधन दे सब खोल
मनवा ओम् नाम नित बोल।।06।।

इधर-उधर जो फिरेगा मारा
कभी मिले ना तुझे किनारा
भेद दिया सब खोल
मनवा ओम् नाम नित बोल।।07।।

हीरा जन्म अमोलक पाया
‘‘संजीव’’ तू इसे समझ न पाया
कांच समझ रहा तोल
मनवा ओम् नाम नित बोल।।08।।

रचना- श्री संजीव कुमार आर्य
मुख्य-संरक्षक, गुरुकुल कुरुक्षेत्र